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Sunday, April 18, 2010

अरे ज्ञानियों खडग धरो

अरे ज्ञानियों खडग धरो

ब्रह्मण का है धर्म ताग , पर क्या बालक भी त्यागी हो ?
जन्म साथ सिलोच्वृति के ही क्या वे अनुरागी हों?
क्या विचित्र रचना समाज ? गिरा ज्ञान ब्रह्मण घर में ,
मोती बरसा वैश्य- वेश्म में , परा खडग क्षत्रिय कर में,

खडग बरा उद्धत होता है , उद्धत होते है राजे ,
इसीलिए तो सदा बजाते रहते वे रन के बाजे ,
और करे ज्ञानी ब्रह्मण क्या ? असी विहीन मन डरता है,
राजा देता मान भूप का भी वह आदर करता है ,

सुनता कौन यहाँ ब्राहमण की, करते सब अपने मन की,
डुबो रही शोणित में भू को भूपों की लिप्सा मन की ,
औ रन किसलिए? नहीं जग से दुख दैन्य भागाने को,
परशोषक, पथ भ्रांत मनुज को नहीं धर्म पर लाने को,

रण केवल इसलिए की राजे और सुखी हों मानी हों,
और प्रजाएं मिले उन्हें,वे और अधिक अभिमानी हों,
रण केवल इसलिए की वे कल्पित अभाव से छूट सकें,
बढे राज्य की सीमा, जिससे अधिक जानो ओ लूट सकें,

अब तो है यह दस की जो कुछ है वह राजा का बल है,
ब्राह्मन खरा सामने केवल लिए शंख गंगाजल है,
कहाँ तेज ब्राह्मन में , अविवेकी राजा को रोक सके,
धरे कुपथ पर जभी पाँव, वह तत्चन उसको टोक सके,

और कहे भी तो ब्राह्मन की बात कौन सुन पाता है?
यहाँ रोज राजा ब्राह्मन को अपमानित करवाता है,
चलती नहीं यहाँ पंडित की, चलती नहीं तपस्वी की,
जय पुकारती प्रजा रात दिन राजा जई यशश्वी की,

सर था जो सारे समाज का वाही अनादर पाता है,
जो भी खिलता फूल भूजा के ऊपर चढ़ता जाता है,
चारों ओर लोभ की ज्वाला चारों ओर भोग की जय,
पाप-भार से दबी दबी जा रही धरा पल-पल निश्चय,

जब तक भोगी भूप प्रजाओ के नेता कहलायेंगे,
ज्ञान,त्याग,तप,नहीं श्रेष्ठता का जबतक पद पायेंगे,
अशन-वशन से हीन दीनता में जीवन धरने वाले ,
सहकर भी अपमान मनुजता की चिंता करने वाले,

कवी, कोविद, विज्ञान-विशारद, कलाकार, पंडित, ज्ञानी,
कनक नहीं कल्पना, ज्ञान, उज्वल, चरित्र के अभिमानी,
इन विभूतियों को जब तक संसार नहीं पहचानेगा,
राजाओं से अधिक पूज्य जब तक न इन्हें वह मानेगा

तब तक परी आग मे धरती इसी तरह अकुलाएगी,
चाहे जो भी करे दुखों से छूट नहीं वह पाएगी,
थकी जीभ समझा कर गहरी लगी ठेश अभिलाषा को,
भूप समझता नहीं और कुछ छोर खडग की भाषा को,

रोक -टोक से नहीं सुनेगा नृप समाज अविचारी है,
ग्रीवाहर,निष्ठुर कुठार का यह मधान्ध अधिकारी है ,
इसीलिए तो मै कहता हूँ अरे ज्ञानियों ! खडग धरो ,
हर न सका जिसको कोई भी , भू का वह तुम त्रास हरो

-रामधारी सिंह 'दिनकर'

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