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Saturday, January 22, 2011

Sri Hanuman Chalisa !

श्री गुरु चरण सरोज राज, निज मन मुकर सुधारी,
बर्नाऊ रघुवर बिमल जासु, जो दायकु फल चारी

बूढी हीन तनु जानिके, सुमिरो, पवन कुमार,
बल बुद्धि विद्या देहु मोही, हरहु कलेश बिकार

जय हनुमान ज्ञान गुना सागर
जय किपिस तिहूँ लोक उज्गार

रामदूत अतुलित बल धमा,
अंजनी पुत्र पवनसुत नामा.

महेबीर बिक्रम बजरंगी,
कुमति निवार सुमति के संगी.

कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित कैसा.

हाथ बाजरा और ध्वजा बिर्जई,
कंधे मूंज जनेऊ सेज.

शंकर सुवना केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जग वंदन.

विद्यावान गुनी अति चतुर,
राम काज करिबे को आतुर

प्रभु चरित्तर सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बस्यिया.

सुक्ष्म रूप धरी सियाही दिख्वाना,
बिकट रूप धरी लंक जरावा

भीम रूप धरी असुर संहार,
रामचंद्र के काज सवार.

लाये सजीवन लखन जियाये,
श्री रघुबीर हरषी उर लाये.

रघुपति किन्ही बहुत बडाई,
तुम मामा प्रिया भारत सम बही.

सहस्त्र बदन तुम्हारो जस गावे,
असा कही श्रीपति कंठ लागावे.

सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा,
नारद सरद सहित अहीसा

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,
कबी कबिद कहीं सके कहाँ ते

तुम उपकार सुग्रिवाही कीन्हा,
राम मिअली राजपद दीन्हा

तुम्हारो मंत्रों बिभीषण माना,
लंकेश्वर भये सब जग जाना.

जुग सहस्त्र जोजन पर भानु,
लील्यो ताहि मधुर फल जानू

प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहीं,
जलधि लांघी गए अचरज नहीं.

दुर्गम काज जगत के जीते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते.

राम दुवारे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिन पैसारे .

सब सुख लहें तुम्हारी सरना,
तुम रक्षक काहू को डरना अ.

आपण तेज सम्हारो आपी,
तनु लोक हांक ते कांपी

भूत पिसाच निकट नही अवेई,
महाबीर जब नाम सुनावेई.

नासी रोग हरे सब पीरा,
जपत निरंटर हनुमंत बीरा

संकट ते हनुमान छुदवेई,
मन क्रम बचन ध्यान जो लावेई.

सुब पर राम तपस्वी राजा,
तिनके काज सकल तुम साजा

और मनोरथ जो कोई लावे,
सोई अमित जीवन फल पावे.

चारो जूंग परताप तुम्हारा,
है परसिद्ध जगत उजियारा.

साधो संत के तुम र अख्वारे,
असुर निकंदन राम दुलारे.

अष्ट सिद्धि नौ निधि के डाटा,
असा बार दिन जानकी माता.

बूढी हीन तनु जानिके, सुमिरो, पवन कुमार,
बल बुद्धि विद्या देहु मोही, हरहु कलेश बिकार

जय हनुमान ज्ञान गुना सागर
जय किपिस तिहूँ लोक उज्गार

रामदूत अतुलित बल धमा,
अंजनी पुत्र पवनसुत नामा.

महेबीर बिक्रम बजरंगी,
कुमति निवार सुमति के संगी.

कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित कैसा.

हाथ बाजरा और ध्वजा बिर्जई,
कंधे मूंज जनेऊ सेज.

शंकर सुवना केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जग वंदन.

विद्यावान गुनी अति चतुर,
राम काज करिबे को आतुर

प्रभु चरित्तर सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बस्यिया.

सुक्ष्म रूप धरी सियाही दिख्वाना,
बिकट रूप धरी लंक जरावा

भीम रूप धरी असुर संहार,
रामचंद्र के काज सवार.

लाये सजीवन लखन जियाये,
श्री रघुबीर हरषी उर लाये.

रघुपति किन्ही बहुत बडाई,
तुम मामा प्रिया भारत सम बही.

सहस्त्र बदन तुम्हारो जस गावे,
असा कही श्रीपति कंठ लागावे.

सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा,
नारद सरद सहित अहीसा

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,
कबी कबिद कहीं सके कहाँ ते

तुम उपकार सुग्रिवाही कीन्हा,
राम मिलाये राज पड़ दीन्हा.

सब सुख लहें तुम्हारी सरना,
तुम रक्षक काहू को डरना.

आपण तेज सम्हारो आपी,
तनु लोक हांक ते कांपी

भूत पिसाच निकट नही अवेई,
महाबीर जब नाम सुनावेई.

नासी रोग हरे सब पीरा,
जपत निरंटर हनुमंत बीरा

संकट ते हनुमान छुदवेई,
मन क्रम बचन ध्यान जो लावेई.

सुब पर राम तपस्वी राजा,
तिनके काज सकल तुम साजा

और मनोरथ जो कोई लावे,
सोई अमित जीवन फल पावे.

चारो जूंग परताप तुम्हारा,
है परसिद्ध जगत उजियारा.

साधो संत के तुम र अख्वारे,
असुर निकंदन राम दुलारे.

अष्ट सिद्धि नौ निधि के डाटा,
असा बार दिन जानकी माता.

राम रसायन तुम्हारे पास,
सदा रहो रघुपति के दस.

तुम्हारे भजन रामको पवेई.
जनम जनम के दुःख बिस्रावेई.

अंत काल रघुबर पुर जय,
जहाँ जन्म हरी भक्त कहै.

और देवता चित्त न धरै,
हनुमंत सी सर्व सुख करे

संकट कटे मिटे सब पीरा,
जो सुमिरि हनुमंत बलबीरा

जय जय जय हनुमान गोसाई
कृपा करहु गुरुदेव की नेई

जो सैट बार पाठ कर कोई,
छुताही बंदी महा सुख होई.

जो यह पढे हनुमान चालीसा,
होय सिद्धि सखी गौरीसा

तुलसीदास सदा हरी चेरा,
कीजे नाथ ह्रदय माह डेरा.

राम रसायन तुम्हारे पास,
सदा रहो रघुपति के दस.

तुम्हारे भजन रामको पवेई.
जनम जनम के दुःख बिस्रावेई.

अंत काल रघुबर पुर जय,
जहाँ जन्म हरी भक्त कहै.

और देवता चित्त न धरै,
हनुमंत सी सर्व सुख करे

संकट कटे मिटे सब पीरा,
जो सुमिरि हनुमंत बलबीरा

जय जय जय हनुमान गोसाई
कृपा करहु गुरुदेव की नेई

जो सैट बार पाठ कर कोई,
छुताही बंदी महा सुख होई.

जो यह पढे हनुमान चालीसा,
होय सिद्धि सखी गौरीसा

तुलसीदास सदा हरी चेरा,
कीजे नाथ ह्रदय माह डेरा.

चोपाई
पवन तनय संकट हरण, मंगल मूर्ति रूप.
राम लखन सीता सहित, ह्रदय बसहु सुर भूप.


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