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Thursday, May 5, 2011

विदाई

प्यारे भाई बांधवों,

मेरा आपसे जो नाता बना है,
मै नहीं समझता,
की अब कभी तोरे भी टूटेगा,

लेकिन क्या करें नियति हमें यही सिखलाती है,
मैंने अपनी पढाई की सुरुआत एक मिटटी के स्लेट और पेंसिल से की थी,

गाँव के ही हाई स्कूल से मैंने दसवीं और बारहवीं पास की 
और अपने पास के छोटे से शहर मुजफ्फरपुर की ओर
अपने मंजिल की तलाश में चल पड़ा.

यहाँ मैं कुल तीन साल रह कर औद्योगिक रसायन से अंतरस्नातक की परीक्षा पास की,
और चला आया मै चेन्नै जहाँ आज हूँ,
मै शायद ज्यादा ही भावुक हो गया हूँ लेकिन बात भी तो भावुक होने वाली ही है?

मै धन्यवाद देना चाहूँगा अपने उन सारे शिक्षकों को जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया
उन दोस्तों को जिन्होंने मेरे साथ अपने और मेरे दुःख सुख के उन छनो को बिताया,
मै अपने इन दिनों को कभी नहीं भूलूंगा ,

आज का दिन मुझे ख़ुशी और गम दोनों से शराबोर दिख रहा है,
और ये ख़ुशी हंसी और दुःख आंसू बन कर निकल रहा है 

Saturday, January 22, 2011

Sri Hanuman Chalisa !

श्री गुरु चरण सरोज राज, निज मन मुकर सुधारी,
बर्नाऊ रघुवर बिमल जासु, जो दायकु फल चारी

बूढी हीन तनु जानिके, सुमिरो, पवन कुमार,
बल बुद्धि विद्या देहु मोही, हरहु कलेश बिकार

जय हनुमान ज्ञान गुना सागर
जय किपिस तिहूँ लोक उज्गार

रामदूत अतुलित बल धमा,
अंजनी पुत्र पवनसुत नामा.

महेबीर बिक्रम बजरंगी,
कुमति निवार सुमति के संगी.

कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित कैसा.

हाथ बाजरा और ध्वजा बिर्जई,
कंधे मूंज जनेऊ सेज.

शंकर सुवना केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जग वंदन.

विद्यावान गुनी अति चतुर,
राम काज करिबे को आतुर

प्रभु चरित्तर सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बस्यिया.

सुक्ष्म रूप धरी सियाही दिख्वाना,
बिकट रूप धरी लंक जरावा

भीम रूप धरी असुर संहार,
रामचंद्र के काज सवार.

लाये सजीवन लखन जियाये,
श्री रघुबीर हरषी उर लाये.

रघुपति किन्ही बहुत बडाई,
तुम मामा प्रिया भारत सम बही.

सहस्त्र बदन तुम्हारो जस गावे,
असा कही श्रीपति कंठ लागावे.

सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा,
नारद सरद सहित अहीसा

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,
कबी कबिद कहीं सके कहाँ ते

तुम उपकार सुग्रिवाही कीन्हा,
राम मिअली राजपद दीन्हा

तुम्हारो मंत्रों बिभीषण माना,
लंकेश्वर भये सब जग जाना.

जुग सहस्त्र जोजन पर भानु,
लील्यो ताहि मधुर फल जानू

प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहीं,
जलधि लांघी गए अचरज नहीं.

दुर्गम काज जगत के जीते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते.

राम दुवारे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिन पैसारे .

सब सुख लहें तुम्हारी सरना,
तुम रक्षक काहू को डरना अ.

आपण तेज सम्हारो आपी,
तनु लोक हांक ते कांपी

भूत पिसाच निकट नही अवेई,
महाबीर जब नाम सुनावेई.

नासी रोग हरे सब पीरा,
जपत निरंटर हनुमंत बीरा

संकट ते हनुमान छुदवेई,
मन क्रम बचन ध्यान जो लावेई.

सुब पर राम तपस्वी राजा,
तिनके काज सकल तुम साजा

और मनोरथ जो कोई लावे,
सोई अमित जीवन फल पावे.

चारो जूंग परताप तुम्हारा,
है परसिद्ध जगत उजियारा.

साधो संत के तुम र अख्वारे,
असुर निकंदन राम दुलारे.

अष्ट सिद्धि नौ निधि के डाटा,
असा बार दिन जानकी माता.

बूढी हीन तनु जानिके, सुमिरो, पवन कुमार,
बल बुद्धि विद्या देहु मोही, हरहु कलेश बिकार

जय हनुमान ज्ञान गुना सागर
जय किपिस तिहूँ लोक उज्गार

रामदूत अतुलित बल धमा,
अंजनी पुत्र पवनसुत नामा.

महेबीर बिक्रम बजरंगी,
कुमति निवार सुमति के संगी.

कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित कैसा.

हाथ बाजरा और ध्वजा बिर्जई,
कंधे मूंज जनेऊ सेज.

शंकर सुवना केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जग वंदन.

विद्यावान गुनी अति चतुर,
राम काज करिबे को आतुर

प्रभु चरित्तर सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बस्यिया.

सुक्ष्म रूप धरी सियाही दिख्वाना,
बिकट रूप धरी लंक जरावा

भीम रूप धरी असुर संहार,
रामचंद्र के काज सवार.

लाये सजीवन लखन जियाये,
श्री रघुबीर हरषी उर लाये.

रघुपति किन्ही बहुत बडाई,
तुम मामा प्रिया भारत सम बही.

सहस्त्र बदन तुम्हारो जस गावे,
असा कही श्रीपति कंठ लागावे.

सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा,
नारद सरद सहित अहीसा

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,
कबी कबिद कहीं सके कहाँ ते

तुम उपकार सुग्रिवाही कीन्हा,
राम मिलाये राज पड़ दीन्हा.

सब सुख लहें तुम्हारी सरना,
तुम रक्षक काहू को डरना.

आपण तेज सम्हारो आपी,
तनु लोक हांक ते कांपी

भूत पिसाच निकट नही अवेई,
महाबीर जब नाम सुनावेई.

नासी रोग हरे सब पीरा,
जपत निरंटर हनुमंत बीरा

संकट ते हनुमान छुदवेई,
मन क्रम बचन ध्यान जो लावेई.

सुब पर राम तपस्वी राजा,
तिनके काज सकल तुम साजा

और मनोरथ जो कोई लावे,
सोई अमित जीवन फल पावे.

चारो जूंग परताप तुम्हारा,
है परसिद्ध जगत उजियारा.

साधो संत के तुम र अख्वारे,
असुर निकंदन राम दुलारे.

अष्ट सिद्धि नौ निधि के डाटा,
असा बार दिन जानकी माता.

राम रसायन तुम्हारे पास,
सदा रहो रघुपति के दस.

तुम्हारे भजन रामको पवेई.
जनम जनम के दुःख बिस्रावेई.

अंत काल रघुबर पुर जय,
जहाँ जन्म हरी भक्त कहै.

और देवता चित्त न धरै,
हनुमंत सी सर्व सुख करे

संकट कटे मिटे सब पीरा,
जो सुमिरि हनुमंत बलबीरा

जय जय जय हनुमान गोसाई
कृपा करहु गुरुदेव की नेई

जो सैट बार पाठ कर कोई,
छुताही बंदी महा सुख होई.

जो यह पढे हनुमान चालीसा,
होय सिद्धि सखी गौरीसा

तुलसीदास सदा हरी चेरा,
कीजे नाथ ह्रदय माह डेरा.

राम रसायन तुम्हारे पास,
सदा रहो रघुपति के दस.

तुम्हारे भजन रामको पवेई.
जनम जनम के दुःख बिस्रावेई.

अंत काल रघुबर पुर जय,
जहाँ जन्म हरी भक्त कहै.

और देवता चित्त न धरै,
हनुमंत सी सर्व सुख करे

संकट कटे मिटे सब पीरा,
जो सुमिरि हनुमंत बलबीरा

जय जय जय हनुमान गोसाई
कृपा करहु गुरुदेव की नेई

जो सैट बार पाठ कर कोई,
छुताही बंदी महा सुख होई.

जो यह पढे हनुमान चालीसा,
होय सिद्धि सखी गौरीसा

तुलसीदास सदा हरी चेरा,
कीजे नाथ ह्रदय माह डेरा.

चोपाई
पवन तनय संकट हरण, मंगल मूर्ति रूप.
राम लखन सीता सहित, ह्रदय बसहु सुर भूप.


बाधायें आती हैं आयें
घिरें प्रलय की घोर घटायें,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालायें,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीघर हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढ़लना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

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हम कैसे है यह किसी को बताये कैसे,
अपना हाल ऐ दिल किसी को समझाए कैसे.

जो छूट ता जा रहा है इस जिंदगी की बाग़ ओ दोह में,
उसको अपने पास बुलाए कैसे.

कल ही तो थे वोह हमारे साथ में,
आज जो लगते है सदियों के फासले, उन्हें मिटाए कैसे.

बोहोत खुशनुमा हुआ करते थे वोह दिन,
कोई बहारों का मौसम आया हो जैसे.

अब गर जो सोचो तो नश्तर से लगते है,
आज उनकी यादों को मिटाए कैसे.

जिंदगी का तो येही फलसफा है ‘अली’,
दिन के बाद रात और रात के बाद दिन हो जैसे.

हमे तो बस चलते जाना है आगे ही आगे,
कोई उसे ना समझ पाये तो समझाए कैसे.

हम कैसे है यह किसी को बताये कैसे,
अपना हाल ऐ दिल किसी को समझाए कैसे.

ढूँढ रहा था इस चेहरे पे मुस्कान को अपनी,
भूल गया में के हालातों से गुज़रा हूँ,

धुंध रहा था परछाई में पहचान को अपनी,
भूल गया में के अंधेरो में खड़ा हूँ.

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आप की खातिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के

चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खून आ जायेगा
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मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने

रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे
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सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खाली कासा
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें

सूदखोर सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।

junbaa


उर्दू किसी समुदाय की जुबान नहीं है और यदि यह किसी समुदाय के पासद ही रही तो खराब हों जाएगी .
इसका विस्तार तभी हों सकता है जब इसे पूरा हिन्दुस्तान अपनाएगा.