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Sunday, September 26, 2010

दीपक पर परवाने आये

दीपक पर परवाने आये

अपने पर फ़र्काते आये,
किरणो पर बल खाते आये,
बरी बरी इच्छाएं लायें,
बरी बरी आशाएं लायें,
दीपक पर परवाने आयें,

जले ज्वलित आलिंगन में कुछ,
जले अग्निमय चुम्बन में कुछ,
रहे अधजले, रहे दूर कुछ,
किन्तु न वापिस जाने पाए,
दीपक पर परवाने आये,

पहुँच गयी बिस्तुइया सत्वर,
लिए उदार की ज्वाल भयंकर,
बचे प्रणय की ज्वाला से जो,
उदर ज्वाल के बीच समाये,
दीपक पर परवाने आये.
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'

यह पपीहे की रटन है !

यह पपीहे की रटन है !

बादलों की घिर घटायें,
भूमि की लेती घटायें,
खोल दिल देती दुआएँ,
देख किस उर में जलन है?
यह पपीहे की जलन है?


जो बहा दे नीर आया,
आग का फिर तीर आया,
बज्र भी बेपीर आया-
कब रुका इसका बचन है?
यह पपीहे की रटन है?

यह न पानी से बुझेगी,
यह न पत्थर से दबेगी,
यह न शोलों से डरेगी,
यह वियोगी की लगन है,
यह पपीहे की रटन है!

-हरिवंश रॉय 'बच्चन'

क्यों रोता है जर तकियों पर?

क्यों रोता है जर तकियों पर?

जिनका उर था स्नेह-विनिर्मित,
भाव सरसता से अभिसिंचित,
जब न पसीजे इनसे वे भी,
आज पसीजेंगे क्या पत्थर?
लयों रोता है जर तकियों पर?

इनमे मानव का जीवन है,
जीवन का नीरव क्रंदन है,
नस्त न कर तू इन बूंदों को,
मरुस्थल के ऊपर बरसाकर,
क्यों रोता है जर तकियों पर?

रो यूँ अक्षर-अक्षर में ही,
रो यूँ गीतों के स्वर में ही,
संत किसी दुनिया का मन हों,
जिनको सूनेपन में गाकर,
क्यों रोता है जर तकियों पर?
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर कर,
तुमने क्यों मेरे चरणों में,
अपना तन मन वर दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?
और न कुछ मै कहने पाया,
मरे अधरों पर निज अधरों-
का तुमने रख भर दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में,
यह प्रतिध्वनी उसकी जो-
उर में तुमने भर उदगार दिया था,
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'

था तुम्हे मैंने रुलाया!

था तुम्हे मैंने रुलाया!

हा तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा न तुमने-
किन्तु वह भी दे न पाया!
था तुम्हे मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था न सुधा गरल था,
एक क्षण को भी सरलते,
क्यों समझ तुमको न पाया?
था तुम्हे मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोंचता हूँ बैठ तट पर-
क्यों अभी तक डूब इसमें,
कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हे मैंने रुलाया!
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'

आ रही रवि की सवारी!

आ रही रवि की सवारी!

नव किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों से अनुचरों ने
स्वर्ण की पोषक धारी!
आ रही रवि की सवारी!

विहाग बंदी और चारण,
गा रहे हैं, कीर्ति-गायन,
छोरकर मैदान भागी-
तारकों की फौज सारी!
आ रही रवि की सवारी!

चाहता उछ्लूं विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह,
रात का राजा खरा है,
राह में बनकर भिखारी!
आ रही रवि की सवारी!

-हरिबंश रॉय 'बच्चन'

भीगी रात विदा अब होती!


भीगी रात विदा अब होती!

रोते रोते ख़त नयन हों,
पीट-वादन हों छाया-तन हों,
पर क्षितिज के रजनी जाती-
अपना आँचल छोर निचोती!
भीगी रात विदा अब होती!


प्राची से उषा हंस परती,
वह्गावालियाँ नौबत झरती,
पल में निर्मम प्रकिरती निशा के-
रोदन के सब चिंता खोती!
भीगी रात विदा अब होती!

हाथ बढ़ा सूरज किरणों के,
पोंछ रहा आंसू सुमनों के,
अपने गीले पंख सुखाते-
तरु पर बैठे कपोत कपोती!
भीगी रात विदा अब होती!
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'

Friday, September 24, 2010

मै उसे फिर पा गया था!

मै उसे फिर पा गया था!

था वही तन था वही मन,
था वही सुकुमार दर्शन,
एक क्षण सौभाग्य का-
छुटा हुआ सा आ गया था!
मै उसे फिर पा गया था!

वह न बोली मै न बोला,
वह न डोली मै न डोला,
पर लगा पल में युगों का-
हाल चाल बता गया था!
मै उसे फिर पा गया था!

चार लोचन डबडबाये!
शब्द सुख कैसे बताए?
देवता के अश्रु मानव के
नयन में छा गया
मै उसे फिर पा गया था!
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'