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Sunday, September 26, 2010

आ रही रवि की सवारी!

आ रही रवि की सवारी!

नव किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों से अनुचरों ने
स्वर्ण की पोषक धारी!
आ रही रवि की सवारी!

विहाग बंदी और चारण,
गा रहे हैं, कीर्ति-गायन,
छोरकर मैदान भागी-
तारकों की फौज सारी!
आ रही रवि की सवारी!

चाहता उछ्लूं विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह,
रात का राजा खरा है,
राह में बनकर भिखारी!
आ रही रवि की सवारी!

-हरिबंश रॉय 'बच्चन'

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