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Saturday, January 22, 2011

हम कैसे है यह किसी को बताये कैसे,
अपना हाल ऐ दिल किसी को समझाए कैसे.

जो छूट ता जा रहा है इस जिंदगी की बाग़ ओ दोह में,
उसको अपने पास बुलाए कैसे.

कल ही तो थे वोह हमारे साथ में,
आज जो लगते है सदियों के फासले, उन्हें मिटाए कैसे.

बोहोत खुशनुमा हुआ करते थे वोह दिन,
कोई बहारों का मौसम आया हो जैसे.

अब गर जो सोचो तो नश्तर से लगते है,
आज उनकी यादों को मिटाए कैसे.

जिंदगी का तो येही फलसफा है ‘अली’,
दिन के बाद रात और रात के बाद दिन हो जैसे.

हमे तो बस चलते जाना है आगे ही आगे,
कोई उसे ना समझ पाये तो समझाए कैसे.

हम कैसे है यह किसी को बताये कैसे,
अपना हाल ऐ दिल किसी को समझाए कैसे.

ढूँढ रहा था इस चेहरे पे मुस्कान को अपनी,
भूल गया में के हालातों से गुज़रा हूँ,

धुंध रहा था परछाई में पहचान को अपनी,
भूल गया में के अंधेरो में खड़ा हूँ.

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1 comment:

  1. गुलजार साब का कविता भी आप पढ़ते है हमें तो मालूम नहीं था

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