यह पपीहे की रटन है !
बादलों की घिर घटायें,
भूमि की लेती घटायें,
खोल दिल देती दुआएँ,
देख किस उर में जलन है?
यह पपीहे की जलन है?
जो बहा दे नीर आया,
आग का फिर तीर आया,
बज्र भी बेपीर आया-
कब रुका इसका बचन है?
यह पपीहे की रटन है?
यह न पानी से बुझेगी,
यह न पत्थर से दबेगी,
यह न शोलों से डरेगी,
यह वियोगी की लगन है,
यह पपीहे की रटन है!
बादलों की घिर घटायें,
भूमि की लेती घटायें,
खोल दिल देती दुआएँ,
देख किस उर में जलन है?
यह पपीहे की जलन है?
जो बहा दे नीर आया,
आग का फिर तीर आया,
बज्र भी बेपीर आया-
कब रुका इसका बचन है?
यह पपीहे की रटन है?
यह न पानी से बुझेगी,
यह न पत्थर से दबेगी,
यह न शोलों से डरेगी,
यह वियोगी की लगन है,
यह पपीहे की रटन है!
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'
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