भीगी रात विदा अब होती!
रोते रोते ख़त नयन हों,
पीट-वादन हों छाया-तन हों,
पर क्षितिज के रजनी जाती-
अपना आँचल छोर निचोती!
भीगी रात विदा अब होती!
प्राची से उषा हंस परती,
वह्गावालियाँ नौबत झरती,
पल में निर्मम प्रकिरती निशा के-
रोदन के सब चिंता खोती!
भीगी रात विदा अब होती!
हाथ बढ़ा सूरज किरणों के,
पोंछ रहा आंसू सुमनों के,
अपने गीले पंख सुखाते-
तरु पर बैठे कपोत कपोती!
भीगी रात विदा अब होती!
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'
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Sunday, September 26, 2010
भीगी रात विदा अब होती!
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