Popular Posts

Sunday, September 26, 2010

क्यों रोता है जर तकियों पर?

क्यों रोता है जर तकियों पर?

जिनका उर था स्नेह-विनिर्मित,
भाव सरसता से अभिसिंचित,
जब न पसीजे इनसे वे भी,
आज पसीजेंगे क्या पत्थर?
लयों रोता है जर तकियों पर?

इनमे मानव का जीवन है,
जीवन का नीरव क्रंदन है,
नस्त न कर तू इन बूंदों को,
मरुस्थल के ऊपर बरसाकर,
क्यों रोता है जर तकियों पर?

रो यूँ अक्षर-अक्षर में ही,
रो यूँ गीतों के स्वर में ही,
संत किसी दुनिया का मन हों,
जिनको सूनेपन में गाकर,
क्यों रोता है जर तकियों पर?
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'

No comments:

Post a Comment