मै उसे फिर पा गया था!
था वही तन था वही मन,
था वही सुकुमार दर्शन,
एक क्षण सौभाग्य का-
छुटा हुआ सा आ गया था!
मै उसे फिर पा गया था!
वह न बोली मै न बोला,
वह न डोली मै न डोला,
पर लगा पल में युगों का-
हाल चाल बता गया था!
मै उसे फिर पा गया था!
चार लोचन डबडबाये!
शब्द सुख कैसे बताए?
देवता के अश्रु मानव के
नयन में छा गया
मै उसे फिर पा गया था!
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'
था वही तन था वही मन,
था वही सुकुमार दर्शन,
एक क्षण सौभाग्य का-
छुटा हुआ सा आ गया था!
मै उसे फिर पा गया था!
वह न बोली मै न बोला,
वह न डोली मै न डोला,
पर लगा पल में युगों का-
हाल चाल बता गया था!
मै उसे फिर पा गया था!
चार लोचन डबडबाये!
शब्द सुख कैसे बताए?
देवता के अश्रु मानव के
नयन में छा गया
मै उसे फिर पा गया था!
-हरिवंश रॉय 'बच्चन'
गिरीश जी ने सुधार की बात सही कही है...ये उनकी बहुत अच्छी कविता है...धन्यवाद यहां पढ़वाने का
ReplyDeletehttp://veenakesur.blogspot.com/
हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें
अच्छा लिख है|
ReplyDeleteहिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
ReplyDeleteहिन्दी में लेखन के लिए धन्यवाद। कृपया श्री गिरीश पंकज की बातों पर ध्यान दें। बधाई ।
ReplyDeleteधन्यवाद्
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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